मैं आदि हूँ, मैं अंत हूँ, पर बीच में बस मौन हूँ, दुनिया जिसे पहचानती, मैं वो नहीं, कोई और हूँ। न नाम है, न रूप है, न देह की दीवार है, अहंकार के उस पार ही, मेरा असली संसार है।
वेद कहते—मैं ही ब्रह्म हूँ, गूँजती यह वाणी है, सूफ़ी कहते—अनल हक़, यह सत्य की ही कहानी है। मगर जब तक ‘मैं’ ज़िंदा है, तब तक केवल शोर है, ‘मैं’ मिटा तो ‘वह’ मिला, जिसकी डोर कहीं ओर है।
मैं सागर की एक लहर नहीं, मैं पूरा विस्तार हूँ, मैं ज्योति का एक कण नहीं, मैं प्रकाश का अम्बार हूँ। पर यह विशालता तब मिली, जब खुद को मैंने खो दिया, अहं का जो बीज था, उसे शून्य में ही बो दिया।
बुद्धि की सीमा थकी, और मन के बंधन टूट गए, शर्मिंदगी के दाग सारे, सत्य के जल में छूट गए। अब न कोई बंदिश है, न कोई अब मजबूरी है, शून्य होना पूर्ण होने की, सबसे पहली दूरी है।
ब्रह्मांड के इस महा-काव्य में, एक छोटा सा बिंदु हूँ, अहंकार से मुक्त होकर, अब मैं सच्चा ‘विभु’ हूँ। शून्य हूँ मैं, शून्य हूँ मैं, अनंत का ही रूप हूँ मैं।