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जग में हाहाकार मचा है, जग से हाहाकार मिटा दे, विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे।

स्वार्थ की अंधी दौड़ थमे अब, भीतर का विश्वास जगे

बाहर जो मरघट फैला है, उसमें करुणा की प्यास जगा दे।

तेरा अंश सनातन, प्राणी बनकर इस जगती में आता,

आती मौत समाता तुझ में, लेकिन प्राणी है घबराता।

तेरा आने-जाने का चक्कर लोगों की समझ न आता,

लहरें सागर से उठती हैं, सागर में ही खो जाती हैं

अद्वैत का पावन सत्य यही, हर आत्मा को समझा दे।

विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे।

आंखें चकाचौंध कर दें, ऐसे रंगीनी रूप दिखाए,

आसमान को छूने वाले, इस धरती पर महल बनाए।

रंग मिटाने, महल गिराने, मानवता के दुश्मन आए

मिट्टी का पुतला मिट्टी पर, मिट्टी की शान दिखाता है,

जो नश्वर है उसे छोड़कर, शाश्वत से परिचय करवा दे।

विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे।

शांति और सुख पाने को हम सबकी आत्मा भटक रही है,

करते भोग-विलास किन्तु मिलता उसमें संतोष नहीं है।

जीवन उलझ रहा आपाधापी में, जिसका अन्त नहीं है

मृगतृष्णा की खोज थमे अब, तृप्ति का आधार मिले

सुख बाहर की वस्तु नहीं, यह बोध हृदय में जगा दे।

विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे।

अंधकार की कोख से जनमी, ये हिंसा की काली छाया,

मिट जाए नफरत की भाषा, खंडित हो अब मोह की माया।

अणु-परमाणु के डर से ऊपर, प्रेम का इक परमाणु खिला,

विश्व एक परिवार बने अब, ‘वसुधैव’ का मंत्र सिखा दे।

विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे।

पुष्पा बजाज, शिलोंग.