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ठाकुर जी ने कहा है “जो स्वयं दीप्त नहीं, वे औरों को कैसे उद्‌दीप्त करेंगे” — बहुत गहरा आध्यात्मिक और व्यवहारिक सत्य बताता है।
इसका भाव जैसा मैने समझा ::
दीप्त यानी भीतर से जाग्रत, प्रेरित, चरित्रवान, सत्यनिष्ठ और आचरण से प्रकाशित।
जो व्यक्ति स्वयं भ्रम, आलस्य, स्वार्थ, डर या अज्ञान में डूबा है — वह दूसरों को सही दिशा नहीं दे सकता।
दीपक बुझा हो तो वह दूसरे दीपक को नहीं जला सकता — पहले स्वयं जलना पड़ता है।
गीता जी के दृष्टांत से समझें:
श्रीकृष्ण ने पहले स्वयं अर्जुन के भ्रम को दूर किया, उसे ज्ञान, स्थिरता और दृष्टि दी — तब अर्जुन समाज के लिए धर्मयुद्ध का साधन बन सका।
अर्थात — पहले अंतर्मन में स्पष्टता, फिर बाहरी कर्म में प्रभाव।
आप सेवा करना चाहते हैं पहले अपने जीवन में अनुशासन और सच्चाई लाएँ
आप प्रेरित करना चाहते हैं पहले स्वयं प्रेरित बनें
आप दूसरों को बदलना चाहते हैं पहले स्वयं का परिवर्तन करें
“पहले अपने भीतर ज्योति जलाओ,
फिर वही ज्योति हजारों दीप जला देगी।”
जय गुरु 🙏
पुष्पा बजाज
शिलांग।