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“समाधान बाहर नहीं, भीतर है”

“समाधान बाहर नहीं, भीतर है” (१९४१ में बिरेन-दा के प्रश्न के उत्तर में) १९४१ में ठाकुर जी के समक्ष बिरेन-दा ने एक अत्यंत गम्भीर प्रश्न रखा— मनुष्य के जीवन में रोग, शोक, अभाव और आपसी अभियोग (आरोप-प्रत्यारोप) निरन्तर क्यों बढ़ते जा रहे हैं, और इसका समाधान क्या है? ठाकुर...

ठाकुर जी ने कहा है “जो स्वयं दीप्त नहीं, वे औरों को कैसे उद्‌दीप्त करेंगे”

ठाकुर जी ने कहा है “जो स्वयं दीप्त नहीं, वे औरों को कैसे उद्‌दीप्त करेंगे” — बहुत गहरा आध्यात्मिक और व्यवहारिक सत्य बताता है। इसका भाव जैसा मैने समझा :: दीप्त यानी भीतर से जाग्रत, प्रेरित, चरित्रवान, सत्यनिष्ठ और आचरण से प्रकाशित। जो व्यक्ति स्वयं भ्रम, आलस्य,...