कौन यहाँ लाता है हम को? कौन यहाँ से ले जाता है? कौन देखता यहाँ नज़ारे? कौन नज़ारे दिखलाता है?
जिसके मौन इशारे पर ये, सृष्टि चक्र घुमाया जाता, जो कर्ता होकर भी जग में, अकर्ता ही कहलाता है।
कौन फूल कलियों में इतनी सुंदरता को भर देता है? कौन बीज का पेड़ बनाकर, फल का बीज बना देता है?
मिट्टी की अंधी परतों में, जो जीवन-गीत जगाता है, शून्य लोक से खींच तत्व को, साकार रूप दे जाता है।
कौन बात कहने से पहले, मतलब समझ रहा है उसका? कौन याद रखता बातों को? कौन बात को दोहराता है?
जो वाणी के पीछे रहकर, मौन अर्थ समझाता है, स्मृतियों की धुंधली गलियों में, जो मशाल जला जाता है।
कौन बहस में उलझाता है? कौन पहेली सुलझाता है? कौन गणित सिखलाकर हम को, भौतिक ज्ञान सिखाता है?
तर्क की तीखी तलवारों पर, जो बुद्धि को नचवाता है, किन्तु अंत में आत्म-बोध का, सरल मार्ग दिखलाता है।
कौन देख कर दर्द किसी का, आँखों में भर लाता पानी? कौन सुखी होता जब कोई, प्रेम किसी पर दिखलाता है?
भेदभाव की दीवारें ढहें, तो जो करुणा बन बहता है, परपीड़ा में जो तड़प उठे, वही ‘राम’ हृदय में रहता है।
कौन लगाता आग बदन में, पास कोई जब आ जाता है? कौन आह ठंडी भरता है, दूर कोई जब हो जाता है?
विरह की अग्नि, मिलन का अमृत, दोनों जिसका रूप हुए, मोह के कच्चे धागों में जो, स्वयं को ही उलझाता है।
कौन जागता रहता है जब गहरी नींद में हम सोते हैं? कौन देखता है स्वप्नों को? कौन स्वप्न को दिखलाता है?
तीन अवस्थाओं से ऊपर, जो ‘तुरीय’ बनकर बैठा है, साक्षी होकर निज सत्ता का, जो प्रमाण बन जाता है।
कौन ज्योति की लहर दिखाता, आँख बंद जब कर लेते हैं? कौन ध्यान करने पर मन में, शांति और सुख भर जाता है?
भीतर के घनघोर अंधेरे में, जो सूरज बन चमका है, परमानंद की चरम अवस्था, जो स्वरूप बन जाता है।
pushpa Bajaj, Shillong